शुक्रवार, 28 सितंबर 2012

दिल से


मैं शायर नहीं हूँ .....पर जो आया दिल में लिख दिया .....कभी कभी जिंदगी में आप को कुछ लोग मिलते हैं जिन्हें आप ताउम्र नहीं भूल सकते हो ......ऐसे ही किसी की याद में कुछ लिख दिया ......


''तुम्हारी आँखों का काजल , बालों का गजरा .......
कानों के झुमके , हाथों के कंगन ........

बहुत प्यारे थे ये सब ......जब तुम हमारे थे ........


तुम्हारे बदन की खुशबु, सांसों की गर्मी ........
इठला के चलना , इतरा के मुड़ना .......


बहुत प्यारे थे ये सब ......जब तुम हमारे थे ........


तुम्हारा अंदाज रूठने का ......लड़ना बिन बात का .....
प्यार जताना  बात -बात पर, मुंह चिढाना मेरी बात पे ....


बहुत प्यारे थे ये सब ......जब तुम हमारे थे ........


तुम्हारा वो कनखियों से मुझे देखना, दबे होठों से मुस्कराना ......
मुड़  कर मुझे देखना, अकेले में मुझे डाँटना .........



बहुत प्यारे थे ये सब ......जब तुम हमारे थे ........


आज तुम नहीं हो साथ मेरे .....पर यादें हैं तुम्हारी मेरे पास .....
बहुत खुश हूँ मैं आज .....की तू खुश है ...किसी और के साथ .....



बहुत प्यारे थे ये सब ......जब तुम हमारे थे ........


वैभव  अवस्थी


बुधवार, 26 सितंबर 2012

तुम्हारी गली


मित्रों कुछ पंक्तियाँ लिखी हैं ........सोचा यहाँ लिख दूँ .....अब कोई शायर तो हूँ नहीं .......फिर भी जो दिल में आया लिख डाला .....



मैं अक्सर उन गलियों में जाता हूँ ....
जहाँ उनके पैरों से फूल खिले  थे ....
उसकी शहद सी मीठी हंसी खिली थी ...
जहाँ उसकी आँखों से काजल  फैला था ....

मैं अक्सर उन गलियों में जाता हूँ ......

वो मोड़ जहाँ से वो पलट कर देखती थी ....
और वो दुपट्टे से अपने चेहरे को ओट देती थी .....
आज भी वो मोड़ उसी जगह पर वहीँ है ......


मैं अक्सर उन गलियों में जाता हूँ ......

जब रात की शबनम उसके गालों को छूती थी .....
और चांदनी उसके बदन को भिगोती थी ....
चन्दन सी खुशबू  उसके उस चांदनी से बदन से आती थी .....


मैं अक्सर उन गलियों में जाता हूँ ......

अफ़सोस गलियां व्ही हैं .....चांदनी वही  है ....
वो मोड़ वहीँ पर है ...बस नहीं है तो वो नहीं है ....
मैं भी हूँ वहीँ पर आज ..पर वो नहीं है ....

पर फिर भी ....


मैं अक्सर उन गलियों में जाता हूँ। ...........





वैभव अवस्थी 

मेरा क़स्बा

कभी कभी  इन शहरों की बड़ी बड़ी इमारतों के आस पास घूमता हुआ ....और अपनी जिंदगी की तलाश करते हुए अपने बचपन के दिन और अपना वो छोटा सा शहर बहुत याद आता है ....जहाँ सब अपने थे। छतों से छतें  मिली थी। आसमानों में पतंगे थी।कभी तितली पकड़ने के लोए दौड़े जाते थे।कभी कंचे खेलते पकडे जाने पर बहुत मार भी खाते थे। बिजली नहीं आती थी पर लालटेन की वो रोशनी और उस रौशनी में उड़ते हुए पतंगे .अजीब सा  था सब कुछ ... पर हाँ सकून  था। शाम को जब गाय  का चारा डालते थे और पिताजी सिखाते थे की कैसे दूध निकालते  हैं और आज भी याद है जब 8 वी  में था  और पहली बार पूरी बाल्टी दूध से भरी थी मैंने खुद गाय  का दूध निकाला  था उस दिन मुझे लग रहा था की मैं बहुत ताकत वर हो गया हूँ . ....और हाँ मेरा कालेज  ..... क्या अध्यापक थे हर  घंटा टाइम से लगता और अध्यापक वो भी सरकारी अध्यापक ऐसे पढ़ाते  थे की अगर वो नहीं पढ़ाएंगे तो उनकी तनख्वाह कट जाएगी। ....पूरी सिद्दत से ........पढ़ाते थे .....पर सिनेमा कभी नहीं देख पाए क्युकी छोटा सा शहर था मेरा सब एक दुसरे को जानते थे तो भला ऐसे में सिनेमा देखने का जोखिम कैसा उठा सकते थे ...पर क्रांतिकारी  केबल टीवी आया और नरसिंह राव जी की सरकार ने हमे नए नए बाज़ार दिये .....तब उम्र जयादा नहीं थे ....8-10 के रहे होंगे ......लगता था एक दिन सारा जहाँ लूट लेंगे .....बहुत अच्छा था सब ........नवरात्रों पर पूरा शहर सजाया जाता था ...फिर नवमी पर जो बारात निकलती थी .......वाह  भाई वाह  .....कित्ती भीड़ होती थी ....आस  पास के हजारों गाँव से उस छोटे से कसबे में मेला लग जाया करता था ...सुना है अब भी निकलती है ....पर पिछले ...12 सालों से मैंने नहीं देखी  है .......जब से अपना क़स्बा छोड़ा है ...और आये हैं महानगर की चका चौंध में लगता है बहुत कुछ छूट गया है ....पर कभी कभी वो सब बहुत याद आता है .....आखिर बचपन काटा  है मैंने वहां पर .....पर अब अपना गाजियाबाद से भी बहुत प्यार है,,सायद ये शहर मेरी जवानी की पहली मोहब्बत है .....हाँ और वो वाली मोहब्बत की भी,....आज मैं इस शहर से बहुत प्यार करता हूँ ...और शायद शहर भी ....पर अपने उस छोटे से शहर को मैंने आज भी जिन्दा रखा है अपने दिल के किसी  कोने में ....वहां के गोलगप्पे ...समोसे ...चाट .....आज भी इस हल्दीराम से लाख बेहतर हैं स्वाद में ......खैर यही कह सकता हूँ।।आज इन ऊँची ऊँची इमारतों के बीच में .......

.''''''अब मैं राशन की कतारों में नजर आता हूँ ...............अपने खेतों से बिछड़ने की सजा पता हूँ''''''''' .........




वैभव अवस्थी 

सोमवार, 26 सितंबर 2011

गरीबी के आंकड़े....

अभी कुछ रोज पहले भारत सरकार के योजना आयोग ने एक शपथ पत्र सुप्रीम कोर्ट में दाखिल किया, जिसमे उन्होंने कहा कि भारत में शहर में रहने वाला व्यक्ति जो कि ३२ रूपये एक दिन में कमाता है और जो व्यक्ति गाँव में रहता है तथा एक दिन में २६ रूपये कमाता है वो गरीब नहीं है और उसे सरकार की तरफ से गरीबों को मिलने वाली रियायतें नहीं मिलने चाहिए....हालाँकि आप हम और यहाँ तक की इस योजना आयोग को चलाने वाले प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और मोंटेक सिंह अहलुवालिया सभी सच्चाई जानते हैं...कि ये आंकड़े फर्जी है और इतने पैसों में दंघ का जहर भी नहीं आ सकता है जिसे कहकर कि आत्महत्या भी कि जा सके , ये सिर्फ इसलिए बनाये गए हैं ताकि गरीबी का आंकड़ा कम दिखा सके और सामानों पर मिल रही सब्सिडी को खत्म किया जा सके..और ये जो एक फितूर है कि साहब ८ % की विकास दर पकडनी है..उसे पकड़ सके और दुनिया में अपनी अर्थव्यवस्था का डंका बजा सकें.....सब कुछ ठीक है..पर सरकार का क्या काम होता है, उसका काम होता है..अपनी जनता को ज्यादा से ज्यादा सुख सुविधाए मुहैया करवाना ..सरकार कोई लाला नहीं है जो बाज़ार में बिज़नस करने के लिए बैठी है और ज्यादा से ज्यादा मुनाफा कमा सके...सरकार का काम है मुनाफा हो न हो..चाहे अपनी जेब से पैसा खर्च करने पड़े..पर जरुरी है की देश की जनता, देश के गरीब..और देश की किसान ,इनका हित हो..ये सरकार की प्राथमिक जिम्मेदारी है....और इन आंकड़ों से कुछ नहीं होता है...आज भारत के ६२७ जिलों में आप खुद जाके देखे तो १०० एक जिलों को छोड़ दे, तो बकाया में हालत ज्यादा ख़राब हैं......अब आते है सब्सिडी पर..जिसका रोना अधिकतर सरकार रोती है कि साहब ...पेट्रोल..और गैस सिलेंडर , खाद पर बहुत सब्सिडी दे रहे हैं....ये कम होनी चाहिए...जरुर कम करे..पर पहले..उधोगों के नाम पर बड़े बड़े औधोगिक घरानों को मिलने वाली सब्सिडी हटाये आप....नेताओं को मिलने वाली सब्सिडी हटाये आप...बड़े अधिकारिओं को मिलने वाली सब्सिडी हटाये आप.....तब आप इस गरीब की सब्सिडी हटाने का हक रखते हैं....खुद अरबों खरबों अपने ऐशी आराम पर खर्च करने वाली सरकार के मंत्रिओं और अधिकारिओं को कोई हक नहीं बनता है कि गरीबों की सब्सिडी हटाये..या तरक्की के नाम पर लोगों को मार दे....अपने देश में कुछ हद तक ये होने लगा है, जहाँ तरक्की के नाम पर लोगों की कीमत कुछ नहीं है...जिसका परिणाम हम नक्साल्वाद के रूप में सामने भी देख रहे हैं पर फिर भी नहीं चेत रहे हैं......देखिये...सरकार अपनी नीतियाँ बनाये, और हर लोकतान्त्रिक सरकार चाहती है कि देश से गरीबी मिटे..पर गरीबी मिटाने के नाम पर आप गरीबों को ही मिटा दे, ये कहाँ तक उचित है.....गरीबों कि गिनती का आंकड़ा काम करने से गरीब काम नहीं होंगे....आप उनके लिए योजनाये तो बनाये ही पर जरुरी है कि उन योजनाओं का क्रियान्वयन भी उचित तरीके से हो और इसकी जवाबदेही भी तय करे..तब जाकर कहीं इस देश से गरीबी कम होगी.....

बुधवार, 2 फ़रवरी 2011

माँ

प्रिय मित्रों

नमस्कार,


दोस्तों आज मुझे एक पुराना गाना याद आया .....जो श्री नन्द लाल पाठक ने लिखा था...और भारत के कई दिग्गज गायकों ने जिसे अपनी आवाज दी.....मैं उस गाने के शब्द लिख रहा हूँ ...उम्मीद है कि आप सबको जरुर पसंद आयेगे......ये कविता या गाना मुझे अन्दर तक शांति देता है.....और मुझे भी अपना बचपन और माँ कि
सुनाई ने हुई कहानियां याद आने लगती है........



माँ सुनाओ मुझे वो कहानी,
जिसमे राजा न हो न हो रानी,

जो हमारी-तुम्हारी कथा हो,
जो सभी के ह्रदय कि व्यथा हो,

गंध जिसमे भरी हो धरा की,
बात जिसमे न हो अप्सरा की,

हो न परियाँ जहाँ आसमानी,
माँ सुनाओ मुझे वो कहानी,

वो कहानी जो हँसना सिखा दे,
पेट की भूख को जो भुला दे,

जिसमे सच कि भरी चांदनी हो,
जिसमे उम्मीद कि रोशनी हो,

जिसमे न हो कहानी पुरानी,
माँ सुनाओ मुझे वो कहानी...................




धन्यवाद

आपका वैभव....

वृद्धाअवस्था

प्रिय मित्रों,
नमस्कार,



आज बहुत समय के बाद वापस ब्लॉग पर आना हुआ....कुछ जिंदगी की जद्दोजहद में ऐसे फंसे कि लिख ही नहीं पाए...आज लिखने का मूड इसलिए हो गया क्यूंकि आज सुबह मुझे एक वृद्धाअवस्था आश्रम में जाने का अवसर मिला.....मेरे अपने ही शहर में स्थिति इस आश्रम में जब मैं गया और वहां के बुजुर्गों से मिला और उनके जीवन और अनुभवों को सुना और उस दर्द को महसूस किया जो उनके दिलों में बसा हुआ था.........उनकी भीगी आँखों से उनके बारे में सुनते हुए मैं भी रोया....कुछ उनके सामने ..कुछ उनके पीछे.......आज कि इस भागती दौड़ती जिंदगी में क्या हमारे अन्दर अपने माँ- बाप तक के लिए सवेंदना समाप्त हो चुकी है....क्या पैसा ही जीवन में महत्वपूर्ण है....या हम सिर्फ अपने लिए ही जीने लगे हैं....इन्ही सवालों के उत्तर मैं अपने आप से पूछ रहा हूँ ..पर कोई सही उत्तर नहीं मिल पा रहा है......अंतर्द्वंद चल रहा है.......पर संतोष नहीं मिल पा रहा है.......हम इस आधुनिकता कि दौड़ में अंधे हो चुके हैं......जिस देश कि सभ्यता और संस्कृति कि हम दुहाई देते हैं...वहां के संस्कार ये तो न थे.......क्या हम ये भूल जाते हैं कि एक दिन ये बुढ़ापा हम पर भी आयेगा.
इस विचारधारा को बदलना ही होगा.....हमारे बुजुर्ग हमारी धरोहर है...हमारी संपत्ति हैं....वो पूरे सम्मान और अधिकारों के हक़दार हैं....


जय हिंद
जय भारत

आपका वैभव

रविवार, 27 जून 2010

एक नज़्म

प्रिय मित्रो।

नमस्कार

इधर काफी समय से जीवन के झंझावातो में ऐसा फ़सा रहा कि समय ही नहीं मिला कुछ लिख सकूँ। जीवन बहुत कठिन है ये बचपन से सुनता आ रहा था अब यकीन हो गया है कि हम जैसा सोचते है हमेशा वैसा नहीं होता है और कभी कभी बहुत बुरा होता है कल्पना से भी परे। मन बहुत उदास रहता है. जीवन में बहुत कुछ करना है पर ये समझ में नहीं आ रहा है कि आखिर क्या होगा। ऐसे ही पन्ने पलटते पलटते जनाब निदा फाजली साहेब कि लिखी एक नज़्म पर नज़र पड़ी जो हिंदी फिल्म आहिस्ता आहिस्ता में मशहूर पार्श्व गायिका श्रीमती आशा भोंसले और भूपेन्द्र जी ने गाया था। कई बार सुना भी परन्तु भूल गया था आज जब ध्यान से पढ़ा इसे, तो ये लगा कि बहुत अच्छी नज़्म है और जिंदगी में बहुत कुछ सीखने को मिलता है। आप के लिए मैं उस नज़्म को लिख रहा हूँ। आपको जरुर बहुत पसंद आयेगी क्यूँ कि इस नज़्म से जिंदगी के उस पहलू का पता चलता है जो हम जैसे करोडो हिन्दुस्तानियों के साथ जरुर होता है। आपके लिए-

कभी किसी को मुकम्मल जहाँ नहीं मिलता
कहीं ज़मीं तो कहीं आस्माँ नहीं मिलता

बुझा सका ह भला कौन वक़्त के शोले
ये ऐसी आग है जिसमें धुआँ नहीं मिलता

तमाम शहर में ऐसा नहीं ख़ुलूस न हो
जहाँ उमीद हो सकी वहाँ नहीं मिलता

कहाँ चिराग़ जलायें कहाँ गुलाब रखें
छतें तो मिलती हैं लेकिन मकाँ नहीं मिलता

ये क्या अज़ाब है सब अपने आप में गुम हैं
ज़बाँ मिली है मगर हमज़बाँ नहीं मिलता

चिराग़ जलते ही बीनाई बुझने लगती है
खुद अपने घर में ही घर का निशाँ नहीं मिलता



कभी किसी को मुकम्मल जहाँ नहीं मिलता
कहीं ज़मीं तो कहीं आसमाँ नहीं मिलता

जिसे भी देखिये वो अपने आप में गुम है
ज़ुबाँ मिली है मगर हमज़ुबा नहीं मिलता

बुझा सका है भला कौन वक़्त के शोले
ये ऐसी आग है जिस में धुआँ नहीं मिलता

तेरे जहान में ऐसा नहीं कि प्यार न हो
जहाँ उम्मीद हो इस की वहाँ नहीं मिलता



इस नज़्म का एक शेर है कि तेरे जहाँ में ऐसा नहीं कि प्यार न हो जहा उम्मीद हो इसकी वहा नहीं मिलता....कडवा सच। उम्मीद है कि फाजली साहेब कि ये रचना जरुर पसंद आयेगी।

धन्यवाद

आपका वैभव.