सोमवार, 9 सितंबर 2013

छोटा सा घर

कभी
नन्हे हाथो से
बनाते थे रेत के घर
देख के उनको लगता था
जैसे हम है कोई जादूगर .......
काश आज फिर से बनाऊ वो रेत के घर....
और सबको दे दूँ एक प्यारा सा अपना सा घर......
फिर भगवन से कहूँ की वो भर दे इन में अपनी कायनात के रंग
और हर इन्सान को मिल जाये अपने सपनो का प्यारा सा एक छोटा सा घर.....

शनिवार, 31 अगस्त 2013

रेड लाइट

आज एक रेड लाइट पर वो अचानक दिखी .....
थोड़ी सी भर गयी है ....
पर ये वजन जँच रहा था उस पे
आँखों में उसकी आज भी वही कशिश है ..

पर सूनापन सा था उसकी नजरों में ......
हाथों में मेरा दिया हुआ कंगन घूम रहा था ....

आँचल उसने यूँ लहरा के ओढ़ा  की
मेरी नजरें उनके हुस्न से हट न सकी

पर लाइट हरी हो गयी और वो फिर से चली गई .....
मैं तनहा था ...तनहा रह गया .....

मैं हारा नहीं हूँ

मैं हारा नहीं हूँ अभी ....                                              
अभी उठूँगा मैं ...                                                        ..
लडूंगा मैं ....
फिर गिरूंगा मैं ...
फिर सम्भलूँगा मैं ...

मैं हारा नहीं हूँ अभी .....
थोडा थका हूँ मैं ....
थोडा रुका हूँ मैं ...
थोडा गिरा  हूँ मैं ....
फिर सम्भ्लूँगा मैं

मैं हारा नहीं हूँ अभी ....
मुश्किलों के भवर में डूबा  हूँ मैं ....
हालातों के जालों में फंसा  हूँ मैं
जीवन के हालातों में फंसा  हूँ मैं   ....
फिर सम्भ्लूँगा मैं ..

मैं हारा नहीं हूँ अभी ...
वक्त का मारा हुआ हूँ मैं ....
किस्मत का ठुकराया हुआ हूँ मैं ....
अपनों का गिराया हूँ मैं ....
फिर सम्भ्लूँगा मैं ....

मैं हरा नहीं हूँ अभी ....

सोमवार, 15 अप्रैल 2013

तेरी कलाइयां



मेरी सारी कायनात जकड़ी हुई हैं इनमें ....
मगर देखने में नर्म हैं तेरी कलाइयां...
मैं अपनी किस्मत को बसाना चाहता हूँ इनमे.....
मगर हर  बार झटक देती हैं तेरी कलाइयाँ......

मेरी जिंदगी की हर सांस फंसी है इनमे....
मगर मुझे छोड़ देती हैं तेरी कलाइयाँ .....

हरे रंग   चूड़ियाँ घूमती  है इनमे... 
मगर बड़ी खूबसूरत हैं   तेरी  कलाइयां..... 

मोहब्बत की सारी कहानियां हैं इनमे.....
मगर मुझे छूने  नहीं  देती हैं तेरी कलाइयां.....

मेरा कंगन पहना लो इन कलायिओं  में ......
तो और हसीं हो जायंगी ये कलाइयां.......

मुझे  पकड़ा दो अपनी ये नाज़ुक कलाइयां...... 
उम्र भर साथ देंगी मेरा फिर तेरी ये कलाइयां.......... 


शनिवार, 13 अप्रैल 2013

कॉलेज वाली सड़क


तपती दोपहर में कॉलेज वाली सड़क पर तुम अपनी बस छोड़कर मेरे साथ पैदल चल देती थी .....
अपनी बड़ी बड़ी आँखों से मुझे देखते हुए पुरे रस्ते मुस्कराती  थी 
और फिर धुप  से बचने के लिए अपने दुपट्टे को सर से ओढ़ कर उसके दोनों कोने दांतों से चबाती थी ....
रस्ते का वो बरगद का पेड़ जहाँ  बैठकर मेरे कन्धों पर अपना सर  सुस्ताती थी ....
मैं चुपके चुपके से तुम्हारा धुप में गुलाबी हुआ चेहरा देखता था ......
पर तुम हमेशा की तरह अपनी ढेर सारी  हास्टल  की बातों का पिटारा खोल देती थी ......
जब हास्टल  आ जाता था तो मुझे समझाते हुए गली के मोड़ से वापस भेज देती थी ...
पर वो गुलाब की कली  जो मैं कॉलेज के फूलों से तोड़ के तुम्हे देता था …
तुम्हारे बालों में लगी वो कली  मुझे  दूर तक मुझे दिखती  रहती थी ......
आज इस तपती दोपहर में फिर आया हूँ इस कॉलेज वाली सड़क पर ....
पर आज मैं पैदल नहीं हूँ ....तुम्हे बस नहीं छोडनी पड़ेगी ....
पर आज ये सड़क सुनसान है ....और पूछ रही है मुझसे कहाँ हो तुम ....
मैं क्या बताऊँ इस कॉलेज वाली सड़क को .....इस तपती दोपहर में ......

शनिवार, 29 सितंबर 2012

बचपन

मेरे बचपन  की कुछ यादें मैंने कविता में पिरोई हैं ....लेखक नहीं हूँ ........तो जो आया उसे शब्दों  में पिरो दिया।


वो बचपन का ज़माना कितना सुहाना था ....
हर कोई अपना था और ज़माना बड़ा प्यारा था।

जब पापा शहंशाह और मैं शहजादा था ....
दस पैसे के दस गोलगप्पे खता था ....
शान से गली में घुमा करता था ....
जिस दिन माँ से एक रुपया मिल जाता था ....
खुद को शहर का निजाम समझता था ....



वो बचपन का ज़माना कितना सुहाना था ....
हर कोई अपना था और ज़माना बड़ा प्यारा था।


तब गली का हर घर अपना घर लगता था ....
अपनी गली और मोहल्ला हमें पूरा जहां लगता था ....
वो माँ से रूठ कर , दादी के हाथ से दाल चावल खाता था ....
अपनी गली को कभी कभी ईडन गार्डन बनता था ....
कईओं के घरों की खिड़कियाँ तोड़ माँ की मार खाता था ....

वो बचपन का ज़माना कितना सुहाना था ....
हर कोई अपना था और ज़माना बड़ा प्यारा था।


दादी की कहानी सुनते सुनते रात को सो जाता था ....
पर आज बड़ा हो गया हूँ ....हकीकत समझता हूँ ....
न मैं शहजादा हूँ ....न पापा शहंशाह थे .....
मैं एक आम आदमी हूँ ...जो खुद को ढूंढ़ते हुए खो चूका है ....

वो बचपन का ज़माना कितना सुहाना था ....
हर कोई अपना था और ज़माना बड़ा प्यारा था।

विस्थापन

कभी विस्थापितों की जिंदगी देखी है। अगर आपने नहीं देखि है,तो कभी भी किसी नए औधोगिक  क्षेत्र में जाकर देखें। एक जिंदगी की तलाश में न जाने कितने लोग अपनी जमीन, अपना देश, अपना गाँव, घर सब कुछ छोड़ कर एक नए अजनबी से शहर में आ जाते हैं। जहाँ सिर्फ एक अच्छी जिंदगी की तलाश रहती है। पर न तो वहां की हवा , न पानी, न खाना, कुछ भी अपना नहीं लगता है। वैसे दिल्ली को भी विस्थापितों का शहर कहा जाता है, पर वहां की भीड़ में ऐसा लगता है की कुछ चेहरे जाने पहचाने से है, अपने से हैं, पर अगर और दुसरे छोटे शहरों या नए बसे आधोगिक क्षेत्र जो की शहरों से बहुत दूर होते हैं उनकी बात की जाये तो बहुत अजीब और कभी-कभी डरावने भी लगते हैं। सुबह से शाम तक एक फैक्ट्री में काम करते रहो और शाम को निकलो तो कोई जानने वाला नहीं फिर रात में सो जाओ, ऐसा लगता है की बाकि साडी दुनिया से संपर्क कट गया हो। और आप ब्रह्माण्ड के किसी दुसरे गृह पर आ गए हो। जीवन में इंसान को क्या-क्या नहीं देखना पड़ता है और ताउम्र पैसों को लेकर इधर से उधर ही भागना पड़ता है क्युकी ये भी कटु सत्य है की बिना पैसों की गाड़ी भी नहीं चलेगी। मनी मैटर करता है , जीवन की बहुत सी खुशियाँ पैसों से ही खरीदी जा सकती है। पैसों का मूल्य बहुत है जीवन में ...खाशकर आज के युग में। हाँ तो बात हो रही थी विस्थापन की, हम सब आजकल विस्थापित हो रहे हैं। किसी नए शहर में खासकर छोटे और नए औधोगिक क्षेत्र में जाकर जिंदगी जीना बड़ा कठिन है। अजीब सी हालत होती है बड़ी घुटन सी होती है।।कमजोर सा महसूस करते हैं। पर वैश्वीकरण के इस दौर में यह एक सच्चाई है और इस झुटलाया नहीं जा सकता है।हमे कोसिस करनी होगी अपने आप को बदलने की और दूसरी संस्कृतियों में स्वय को ढालने की , इश्वर ने जो लिखा है उसे स्वीकार करना होगा।

वैभव अवस्थी


शुक्रवार, 28 सितंबर 2012

दिल से


मैं शायर नहीं हूँ .....पर जो आया दिल में लिख दिया .....कभी कभी जिंदगी में आप को कुछ लोग मिलते हैं जिन्हें आप ताउम्र नहीं भूल सकते हो ......ऐसे ही किसी की याद में कुछ लिख दिया ......


''तुम्हारी आँखों का काजल , बालों का गजरा .......
कानों के झुमके , हाथों के कंगन ........

बहुत प्यारे थे ये सब ......जब तुम हमारे थे ........


तुम्हारे बदन की खुशबु, सांसों की गर्मी ........
इठला के चलना , इतरा के मुड़ना .......


बहुत प्यारे थे ये सब ......जब तुम हमारे थे ........


तुम्हारा अंदाज रूठने का ......लड़ना बिन बात का .....
प्यार जताना  बात -बात पर, मुंह चिढाना मेरी बात पे ....


बहुत प्यारे थे ये सब ......जब तुम हमारे थे ........


तुम्हारा वो कनखियों से मुझे देखना, दबे होठों से मुस्कराना ......
मुड़  कर मुझे देखना, अकेले में मुझे डाँटना .........



बहुत प्यारे थे ये सब ......जब तुम हमारे थे ........


आज तुम नहीं हो साथ मेरे .....पर यादें हैं तुम्हारी मेरे पास .....
बहुत खुश हूँ मैं आज .....की तू खुश है ...किसी और के साथ .....



बहुत प्यारे थे ये सब ......जब तुम हमारे थे ........


वैभव  अवस्थी


बुधवार, 26 सितंबर 2012

तुम्हारी गली


मित्रों कुछ पंक्तियाँ लिखी हैं ........सोचा यहाँ लिख दूँ .....अब कोई शायर तो हूँ नहीं .......फिर भी जो दिल में आया लिख डाला .....



मैं अक्सर उन गलियों में जाता हूँ ....
जहाँ उनके पैरों से फूल खिले  थे ....
उसकी शहद सी मीठी हंसी खिली थी ...
जहाँ उसकी आँखों से काजल  फैला था ....

मैं अक्सर उन गलियों में जाता हूँ ......

वो मोड़ जहाँ से वो पलट कर देखती थी ....
और वो दुपट्टे से अपने चेहरे को ओट देती थी .....
आज भी वो मोड़ उसी जगह पर वहीँ है ......


मैं अक्सर उन गलियों में जाता हूँ ......

जब रात की शबनम उसके गालों को छूती थी .....
और चांदनी उसके बदन को भिगोती थी ....
चन्दन सी खुशबू  उसके उस चांदनी से बदन से आती थी .....


मैं अक्सर उन गलियों में जाता हूँ ......

अफ़सोस गलियां व्ही हैं .....चांदनी वही  है ....
वो मोड़ वहीँ पर है ...बस नहीं है तो वो नहीं है ....
मैं भी हूँ वहीँ पर आज ..पर वो नहीं है ....

पर फिर भी ....


मैं अक्सर उन गलियों में जाता हूँ। ...........





वैभव अवस्थी 

मेरा क़स्बा

कभी कभी  इन शहरों की बड़ी बड़ी इमारतों के आस पास घूमता हुआ ....और अपनी जिंदगी की तलाश करते हुए अपने बचपन के दिन और अपना वो छोटा सा शहर बहुत याद आता है ....जहाँ सब अपने थे। छतों से छतें  मिली थी। आसमानों में पतंगे थी।कभी तितली पकड़ने के लोए दौड़े जाते थे।कभी कंचे खेलते पकडे जाने पर बहुत मार भी खाते थे। बिजली नहीं आती थी पर लालटेन की वो रोशनी और उस रौशनी में उड़ते हुए पतंगे .अजीब सा  था सब कुछ ... पर हाँ सकून  था। शाम को जब गाय  का चारा डालते थे और पिताजी सिखाते थे की कैसे दूध निकालते  हैं और आज भी याद है जब 8 वी  में था  और पहली बार पूरी बाल्टी दूध से भरी थी मैंने खुद गाय  का दूध निकाला  था उस दिन मुझे लग रहा था की मैं बहुत ताकत वर हो गया हूँ . ....और हाँ मेरा कालेज  ..... क्या अध्यापक थे हर  घंटा टाइम से लगता और अध्यापक वो भी सरकारी अध्यापक ऐसे पढ़ाते  थे की अगर वो नहीं पढ़ाएंगे तो उनकी तनख्वाह कट जाएगी। ....पूरी सिद्दत से ........पढ़ाते थे .....पर सिनेमा कभी नहीं देख पाए क्युकी छोटा सा शहर था मेरा सब एक दुसरे को जानते थे तो भला ऐसे में सिनेमा देखने का जोखिम कैसा उठा सकते थे ...पर क्रांतिकारी  केबल टीवी आया और नरसिंह राव जी की सरकार ने हमे नए नए बाज़ार दिये .....तब उम्र जयादा नहीं थे ....8-10 के रहे होंगे ......लगता था एक दिन सारा जहाँ लूट लेंगे .....बहुत अच्छा था सब ........नवरात्रों पर पूरा शहर सजाया जाता था ...फिर नवमी पर जो बारात निकलती थी .......वाह  भाई वाह  .....कित्ती भीड़ होती थी ....आस  पास के हजारों गाँव से उस छोटे से कसबे में मेला लग जाया करता था ...सुना है अब भी निकलती है ....पर पिछले ...12 सालों से मैंने नहीं देखी  है .......जब से अपना क़स्बा छोड़ा है ...और आये हैं महानगर की चका चौंध में लगता है बहुत कुछ छूट गया है ....पर कभी कभी वो सब बहुत याद आता है .....आखिर बचपन काटा  है मैंने वहां पर .....पर अब अपना गाजियाबाद से भी बहुत प्यार है,,सायद ये शहर मेरी जवानी की पहली मोहब्बत है .....हाँ और वो वाली मोहब्बत की भी,....आज मैं इस शहर से बहुत प्यार करता हूँ ...और शायद शहर भी ....पर अपने उस छोटे से शहर को मैंने आज भी जिन्दा रखा है अपने दिल के किसी  कोने में ....वहां के गोलगप्पे ...समोसे ...चाट .....आज भी इस हल्दीराम से लाख बेहतर हैं स्वाद में ......खैर यही कह सकता हूँ।।आज इन ऊँची ऊँची इमारतों के बीच में .......

.''''''अब मैं राशन की कतारों में नजर आता हूँ ...............अपने खेतों से बिछड़ने की सजा पता हूँ''''''''' .........




वैभव अवस्थी 

सोमवार, 26 सितंबर 2011

गरीबी के आंकड़े....

अभी कुछ रोज पहले भारत सरकार के योजना आयोग ने एक शपथ पत्र सुप्रीम कोर्ट में दाखिल किया, जिसमे उन्होंने कहा कि भारत में शहर में रहने वाला व्यक्ति जो कि ३२ रूपये एक दिन में कमाता है और जो व्यक्ति गाँव में रहता है तथा एक दिन में २६ रूपये कमाता है वो गरीब नहीं है और उसे सरकार की तरफ से गरीबों को मिलने वाली रियायतें नहीं मिलने चाहिए....हालाँकि आप हम और यहाँ तक की इस योजना आयोग को चलाने वाले प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और मोंटेक सिंह अहलुवालिया सभी सच्चाई जानते हैं...कि ये आंकड़े फर्जी है और इतने पैसों में दंघ का जहर भी नहीं आ सकता है जिसे कहकर कि आत्महत्या भी कि जा सके , ये सिर्फ इसलिए बनाये गए हैं ताकि गरीबी का आंकड़ा कम दिखा सके और सामानों पर मिल रही सब्सिडी को खत्म किया जा सके..और ये जो एक फितूर है कि साहब ८ % की विकास दर पकडनी है..उसे पकड़ सके और दुनिया में अपनी अर्थव्यवस्था का डंका बजा सकें.....सब कुछ ठीक है..पर सरकार का क्या काम होता है, उसका काम होता है..अपनी जनता को ज्यादा से ज्यादा सुख सुविधाए मुहैया करवाना ..सरकार कोई लाला नहीं है जो बाज़ार में बिज़नस करने के लिए बैठी है और ज्यादा से ज्यादा मुनाफा कमा सके...सरकार का काम है मुनाफा हो न हो..चाहे अपनी जेब से पैसा खर्च करने पड़े..पर जरुरी है की देश की जनता, देश के गरीब..और देश की किसान ,इनका हित हो..ये सरकार की प्राथमिक जिम्मेदारी है....और इन आंकड़ों से कुछ नहीं होता है...आज भारत के ६२७ जिलों में आप खुद जाके देखे तो १०० एक जिलों को छोड़ दे, तो बकाया में हालत ज्यादा ख़राब हैं......अब आते है सब्सिडी पर..जिसका रोना अधिकतर सरकार रोती है कि साहब ...पेट्रोल..और गैस सिलेंडर , खाद पर बहुत सब्सिडी दे रहे हैं....ये कम होनी चाहिए...जरुर कम करे..पर पहले..उधोगों के नाम पर बड़े बड़े औधोगिक घरानों को मिलने वाली सब्सिडी हटाये आप....नेताओं को मिलने वाली सब्सिडी हटाये आप...बड़े अधिकारिओं को मिलने वाली सब्सिडी हटाये आप.....तब आप इस गरीब की सब्सिडी हटाने का हक रखते हैं....खुद अरबों खरबों अपने ऐशी आराम पर खर्च करने वाली सरकार के मंत्रिओं और अधिकारिओं को कोई हक नहीं बनता है कि गरीबों की सब्सिडी हटाये..या तरक्की के नाम पर लोगों को मार दे....अपने देश में कुछ हद तक ये होने लगा है, जहाँ तरक्की के नाम पर लोगों की कीमत कुछ नहीं है...जिसका परिणाम हम नक्साल्वाद के रूप में सामने भी देख रहे हैं पर फिर भी नहीं चेत रहे हैं......देखिये...सरकार अपनी नीतियाँ बनाये, और हर लोकतान्त्रिक सरकार चाहती है कि देश से गरीबी मिटे..पर गरीबी मिटाने के नाम पर आप गरीबों को ही मिटा दे, ये कहाँ तक उचित है.....गरीबों कि गिनती का आंकड़ा काम करने से गरीब काम नहीं होंगे....आप उनके लिए योजनाये तो बनाये ही पर जरुरी है कि उन योजनाओं का क्रियान्वयन भी उचित तरीके से हो और इसकी जवाबदेही भी तय करे..तब जाकर कहीं इस देश से गरीबी कम होगी.....

बुधवार, 2 फ़रवरी 2011

माँ

प्रिय मित्रों

नमस्कार,


दोस्तों आज मुझे एक पुराना गाना याद आया .....जो श्री नन्द लाल पाठक ने लिखा था...और भारत के कई दिग्गज गायकों ने जिसे अपनी आवाज दी.....मैं उस गाने के शब्द लिख रहा हूँ ...उम्मीद है कि आप सबको जरुर पसंद आयेगे......ये कविता या गाना मुझे अन्दर तक शांति देता है.....और मुझे भी अपना बचपन और माँ कि
सुनाई ने हुई कहानियां याद आने लगती है........



माँ सुनाओ मुझे वो कहानी,
जिसमे राजा न हो न हो रानी,

जो हमारी-तुम्हारी कथा हो,
जो सभी के ह्रदय कि व्यथा हो,

गंध जिसमे भरी हो धरा की,
बात जिसमे न हो अप्सरा की,

हो न परियाँ जहाँ आसमानी,
माँ सुनाओ मुझे वो कहानी,

वो कहानी जो हँसना सिखा दे,
पेट की भूख को जो भुला दे,

जिसमे सच कि भरी चांदनी हो,
जिसमे उम्मीद कि रोशनी हो,

जिसमे न हो कहानी पुरानी,
माँ सुनाओ मुझे वो कहानी...................




धन्यवाद

आपका वैभव....

वृद्धाअवस्था

प्रिय मित्रों,
नमस्कार,



आज बहुत समय के बाद वापस ब्लॉग पर आना हुआ....कुछ जिंदगी की जद्दोजहद में ऐसे फंसे कि लिख ही नहीं पाए...आज लिखने का मूड इसलिए हो गया क्यूंकि आज सुबह मुझे एक वृद्धाअवस्था आश्रम में जाने का अवसर मिला.....मेरे अपने ही शहर में स्थिति इस आश्रम में जब मैं गया और वहां के बुजुर्गों से मिला और उनके जीवन और अनुभवों को सुना और उस दर्द को महसूस किया जो उनके दिलों में बसा हुआ था.........उनकी भीगी आँखों से उनके बारे में सुनते हुए मैं भी रोया....कुछ उनके सामने ..कुछ उनके पीछे.......आज कि इस भागती दौड़ती जिंदगी में क्या हमारे अन्दर अपने माँ- बाप तक के लिए सवेंदना समाप्त हो चुकी है....क्या पैसा ही जीवन में महत्वपूर्ण है....या हम सिर्फ अपने लिए ही जीने लगे हैं....इन्ही सवालों के उत्तर मैं अपने आप से पूछ रहा हूँ ..पर कोई सही उत्तर नहीं मिल पा रहा है......अंतर्द्वंद चल रहा है.......पर संतोष नहीं मिल पा रहा है.......हम इस आधुनिकता कि दौड़ में अंधे हो चुके हैं......जिस देश कि सभ्यता और संस्कृति कि हम दुहाई देते हैं...वहां के संस्कार ये तो न थे.......क्या हम ये भूल जाते हैं कि एक दिन ये बुढ़ापा हम पर भी आयेगा.
इस विचारधारा को बदलना ही होगा.....हमारे बुजुर्ग हमारी धरोहर है...हमारी संपत्ति हैं....वो पूरे सम्मान और अधिकारों के हक़दार हैं....


जय हिंद
जय भारत

आपका वैभव

रविवार, 27 जून 2010

एक नज़्म

प्रिय मित्रो।

नमस्कार

इधर काफी समय से जीवन के झंझावातो में ऐसा फ़सा रहा कि समय ही नहीं मिला कुछ लिख सकूँ। जीवन बहुत कठिन है ये बचपन से सुनता आ रहा था अब यकीन हो गया है कि हम जैसा सोचते है हमेशा वैसा नहीं होता है और कभी कभी बहुत बुरा होता है कल्पना से भी परे। मन बहुत उदास रहता है. जीवन में बहुत कुछ करना है पर ये समझ में नहीं आ रहा है कि आखिर क्या होगा। ऐसे ही पन्ने पलटते पलटते जनाब निदा फाजली साहेब कि लिखी एक नज़्म पर नज़र पड़ी जो हिंदी फिल्म आहिस्ता आहिस्ता में मशहूर पार्श्व गायिका श्रीमती आशा भोंसले और भूपेन्द्र जी ने गाया था। कई बार सुना भी परन्तु भूल गया था आज जब ध्यान से पढ़ा इसे, तो ये लगा कि बहुत अच्छी नज़्म है और जिंदगी में बहुत कुछ सीखने को मिलता है। आप के लिए मैं उस नज़्म को लिख रहा हूँ। आपको जरुर बहुत पसंद आयेगी क्यूँ कि इस नज़्म से जिंदगी के उस पहलू का पता चलता है जो हम जैसे करोडो हिन्दुस्तानियों के साथ जरुर होता है। आपके लिए-

कभी किसी को मुकम्मल जहाँ नहीं मिलता
कहीं ज़मीं तो कहीं आस्माँ नहीं मिलता

बुझा सका ह भला कौन वक़्त के शोले
ये ऐसी आग है जिसमें धुआँ नहीं मिलता

तमाम शहर में ऐसा नहीं ख़ुलूस न हो
जहाँ उमीद हो सकी वहाँ नहीं मिलता

कहाँ चिराग़ जलायें कहाँ गुलाब रखें
छतें तो मिलती हैं लेकिन मकाँ नहीं मिलता

ये क्या अज़ाब है सब अपने आप में गुम हैं
ज़बाँ मिली है मगर हमज़बाँ नहीं मिलता

चिराग़ जलते ही बीनाई बुझने लगती है
खुद अपने घर में ही घर का निशाँ नहीं मिलता



कभी किसी को मुकम्मल जहाँ नहीं मिलता
कहीं ज़मीं तो कहीं आसमाँ नहीं मिलता

जिसे भी देखिये वो अपने आप में गुम है
ज़ुबाँ मिली है मगर हमज़ुबा नहीं मिलता

बुझा सका है भला कौन वक़्त के शोले
ये ऐसी आग है जिस में धुआँ नहीं मिलता

तेरे जहान में ऐसा नहीं कि प्यार न हो
जहाँ उम्मीद हो इस की वहाँ नहीं मिलता।



इस नज़्म का एक शेर है कि तेरे जहाँ में ऐसा नहीं कि प्यार न हो जहा उम्मीद हो इसकी वहा नहीं मिलता....कडवा सच। उम्मीद है कि फाजली साहेब कि ये रचना जरुर पसंद आयेगी।

धन्यवाद

आपका वैभव.

गुरुवार, 8 अप्रैल 2010

दंतेवाडा के शहीद

प्रिय मित्रो,



नमस्कार



इधर काफी समय से व्यस्त रहा तो कुछ मौका नहीं मिला। पर बीते दिन दंतेवाडा में हुई घटना ने मन मस्तिष्क को अन्दर तक झकझोर दिया। नक्सलवादियो ने केंद्रीय रिजेर्वे पुलिस फ़ोर्स के ७६ जवानों को मौत के घाट उतार दिया। खून खौल उठा ये सोच कर कि हमारी सेना के इतने जवान मार दिए गए और हमारी सरकार आज भी यह कह रही है। कि कोई भी सख्त कदम नहीं उठायेगे। मतलब आर्मी की या वायु सेना की मदद नहीं ली जायेगी क्यों कि जो लोग लड़ रहे है वो हमारे ही देश के ही नागरिक हैं । और उनके साथ अन्याय हुआ है इसलिए वो ये विद्रोह कर रहे हैं। उनके इलाके में विकास नहीं हुआ है इसलिए वो ऐसा कर रहे हैं , तो मैं समझता हूँ । की हिंदुस्तान के हर बेरोजगार व्यक्ति को जिनमे मै भी शामिल हूँ आजकल, हथियार उठा लेना चाहिए और सराकर के खिलाफ आन्दोलन छेड़ देना चाहिए। मैं उन बुद्धजीवियों से भी जानना चाहता हूँ कि क्या इस देश में हिंसा जो की आपके चहेते माओवादी कर रहे हैं उचित है। मैं मानता हूँ कि उन इलाको के साथ अन्याय हुआ है। मेरा घर भी उत्तर प्रदेश के एक ऐसे इलाके में है , जो बहुत पिछड़ा है। मेरे गाँव में आज भी सड़क और बिजली नहीं है। मुझे भी गाँववालो को एकत्र कर के हथियाए उठाने चाहिए या महात्मा गाँधी ले बताये हुए रस्ते पर चलकर अहिंसा पूर्वक आन्दोलन कर के सरकार को हिलाना चाहिए, या फिर भगत सिंह की तरह से बम्ब तो फोड़ो परन्तु आवाज के लिए, किसी की जान लेने के लिए नहीं । भारत सरकार को चहिये कि देल्ही के आलावा देश के और हिस्सों का भी समग्र विकास करे। और इन मओवादियो से सख्ती से निपट और इन तथाकथित बुद्धजीवियो से न डरे। क्या १९६६ में जब सरकार ने मणिपुर में और मिजोरम में सस्त्र कार्यवाई की तो क्या वो उग्रवादी भटके हुए नवजवान नहीं थे, जिन्हें मारने के लिए सरकार ने हवाई हमले किये थे। मेरा बस इतना मानना है की हिंसा से समाधान नहीं हो सकता है। और मओवादियो को भी समझना चाहिए की हिंसा से आप हमारे देश से लड़ नहीं सकते हैं। ये एक लोकतान्त्रिक देश है जिसे थोड़ा समय तो लगेगा विकसित होने में परन्तु मेरा देश बहुत अच्छा है। और बुद्धजीवियो से अनुरोध है की कृपया करके सरकार से वार्ता करने के लिए आगे लाये इन मओवादियो को ताकि समाधान निकल सके, तो जो भी आपकी मांगे है सुनी जाएगी। मैं पी. चिदंबरम साहेब से सहमत हूँ और उनसे अनुशंसा करता हूँ कि कृपया राज्यों को मत देखे और कड़ी से कड़ी कार्यवाही करे। मओवादियो से भी ये अपील है की लोकतान्त्रिक तरीके से अपने आन्दोलन चलाये और आगे आ कर सरकार से बात करे।

अंत में सभी शहीदों को सत सत नमन , भारत देश के सभी नागरिक आपके कर्जदार हैं।


जय हिंद



धन्यवाद

आपका वैभव

बुधवार, 24 फ़रवरी 2010

श्रधांजलि



प्रिय
मित्रो।

नमस्कार।


कल शाम को शहर में घूम रहा था तो पान की दुकान पे सायं काल का अख़बार देखा, कि हमारे शहर का एक युवा.....कैप्टेन देवेंदर सिंह जस का सोपोर(कश्मीर) में आतंकवादियो के साथ हुई मुठभेड़ में निधन हो गया यानि की वो युवा शहीद हो गए। एक और माँ का लाल अपने देश के लिए अपने प्राणों की आहुति दे गया...आँखों में हल्कि सी नमी आ गई पर सीना फक्र से चौड़ा हो गया ...आखिर ये हैं बोर्डर पर तभी हम यहाँ बैठ कर चैन की जिंदगी काट रहे हैं...आज सुबह सोचा उनके निवास पर जाऊ, वहा पंहुचा तो वहां का गमनीम माहौल देख कर स्वत ही नीर बह चला। पता चला कि माँ बाप का अकेला लाल अपनी कॉर्पोरेट लाइफ को छोड़ कर अभी दो साल पहले ही देशभक्ति की भावना को ओडे थल सेना में शामिल हुआ था और संयोग से वो उसी यूनिट में था जिस यूनिट के मेजर मोहित शर्मा थे वो भी गाजिअबाद से ही थे और वो भी पिछले साल शहीद हुए थे...... आज कैप्टेन के पिता के चेहरे पर एक दुःख के साथ जो गर्व था वो बहुत कम माँ बाप को ही नसीब होता है...काश मेरे माँ बाप भी इस फक्र को कभी महसूस करे..काश मेरी जान भी इस देश की सेवा करते हुए जाये। मै ईश्वर से ये प्रार्थना करता हूँ। कि उनके परिवार को इस दुःख को सहने की शक्ति प्रदत्त करे। मेरी सारी भावनाये उनके साथ हैं । ईश्वर कैप्टेन की आत्मा को शांति दे। अप सब भी उन्हें अपनी श्रधांजलि दे।


धन्यवाद।



आपका वैभव।